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सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

'अहिल्या से अनूसुइया तक'    --  (कहानी)

 डॉ. संध्या तिवारी ,पीलीभीत


मेरी भी शादी किसी बडे शहर के राजकुमार से होगी ।"
मै कहती ; " तुझे कैसे पता ?
तो वह कहती ; " अरे ! देख मै कित्ती सुन्दर हूं , मेरी आंखे हेमामालिनी सी कटीली है कि नही। मेरे कमर से नीचे लहराते काले बाल और सबसे बडी बात मैने आंठवां भी तो पास कर लिया है ।
उसकी भोली बाते सुन मै मुस्कुरा पडती।
           सच में उसके जीवन का बहुत बडा सपना ही शादी था । क्योकि शादी ही एकमात्र उसके गांव से निकलने का रास्ता थी ।
       गोबर , मिट्टी , भूसा , सानी , अनाजों की कोठरी , गुड ,राव , ढोर- डंगर से पीछा छुडाने का यही एक मात्र और अंतिम उपाय उसे दीखता था।
          जब वह छोटे से शीशे में अपने नैन नक्श निहारती तो खुद पर मोहित हो जाती , और मुझ से कहती ;  " देखना , मेरे दुल्हे की एक रात भी मेरे बिना नही कटेगी। " और अपने सुडौल हाथो  को अपने ही इर्द-गिर्द लपेटती किसी राजकुमार  की अंकशायनी की कल्पना में तल्लीन हो जोर से हंस पडती ।
मै उसे चिकोटी काटती हुई कहती कोई और से सपने भी देख लिया करो महारानी ।
लेकिन मेरी सहेली का जीवन ही जैसे "राम की आस में अहिल्या " सा तब्दील हो गया था।
उसका ओढना बिछाना एक ही था ।उसके सपनों का राजकुमार , राजकुमार और राजकुमार ।
      आज उसकी शादी की पचासवीं साल गिरह है । इस मौके पर उसने मुझे भी बुलाया ।
        उसने झुर्री दार हाथों में मेंहदी लगायी थी। माथे पर बडी सी शिल्पा बिन्दी लगायी । आंखो में काजल डाला । होठो पर  पिंक लिप्सटिक लगायी । सिल्क की साडी के साथ मैचिंग चूडिया पहनी। और फिर पत्थर सा भाव विहीन चेहरा लिये  डिमनेशिया के शिकार पति का हाथ पकड़ कर उस सोफे पर जा बैठी जो उसके लिये तैयार किया गया था।
             मेरी नजरें उसकी शिल्पा बिन्दी पर अटक कर रह गयीं।मन ने कहा यह वह सुधा तो नहीं,  जिसे मै जानती थी ,जो मेरी बचपन की गंवार सहेली हुआ करती थी । वह तो ऐसी  ग्रामीण महिला थी कि सिन्दूर के बिना उसका श्रृंगार ही पूरा नही होता था , लेकिन आज तो सिन्दूर कहीं छू भर नहीं गया। खैर....
इतने सालो में उसके साथ बहुत कुछ घट भी तो गया ।और समय तो अच्छे अच्छों को बदल देता है तो सुधा क्या चीज है भला ।
यह सोच कर मैं बरबस ही अतीत में खिची चली गयी
          बचपन के वे दिन भी क्या दिन थे जब सुधा और मै हम दोनो गांव में पीपल के पेड के नीचे खेलते थे , और बरसात की शामो में जुगनू पूरे पीपल को ऐसे जगमग कर देते थे- जैसे शहर की शादियों में सजा कोई बेंकेट हाल ।
सुधा बडे भोलेपन से मुझसे  पूछती ;      
  " उमा यह सारे जुगनू यहां ही क्यों जमा हुये है?"
और मैं अपना रोब जमाने के लिये कहती ; " यह सब सजावट के लिये भगवान के घर से भेजे गये है ।
परियों  की बारात जो है न ।
यहां रोज एक परी की शादी होती है । और बाकी परियां यहां नाचती है ।
लेकिन उन्हे पसन्द नहीं कि कोई इन्सान उनका उत्सव देखे ।
और जो कोई जान-बूझ कर देखता है , उसकी शादी नही होती , जिन्दगी भर। इसलिये वह सब बहुत रात गये यहां आतीं है ।
और सबेरे तडके यहां से चली जाती है । "
          मैने डर से उसकी  चौडी हुयी आंखो में थोडा और डर झोंकते  हुये  राज की बात बताई। 
       "तुम भूल कर भी मत देखना , क्योंकि तुम्हारा घर तो ठीक पीपल के सामने ही पडता है।"
    जब से मैने यह राज उसे बताया था तब से बिना किसी वाद प्रतिवाद के वह हर रोज सांझ ढले  दौड कर अंदर चली जाती और बाहर खुलने बाली सब खिडकी दरवाजे बन्द कर लेती।
           सुबह जब मै उससे पूंछती तो वह बडे मासूम अंदाज में सिर हिला कर कहती ; "न आं सुधा मैने तो झिरी तक से नहीं झांका।
        मै उसकी बेबकूफी पर उसे शाबाशी देती और वह इसे अपनी तारीफ समझ कर खुश हो जाती ।
               उसे बुद्धू बना कर मुझमे एक आत्मविश्वास  भर जाता और मै खुद को उससे ज्यादा काबिल समझ आत्म मुग्ध हो जाती।
            हमारी  शादियो में करीब आठ साल का अन्तर था ।क्योकि वह गांव मे ही रही और गांव के स्कूल से  आठवां पास किया ।फिर सत्रह साल मे उसकी शादी भी हो गयी ।
            उसकी नयी नयी शादी थी उसे सजने संवरने का भी बहुत शौक था ।
              यूं तो हम भारतीय हिन्दू स्त्रियां सिन्दूर का इस्तेमाल सुहाग चिन्ह के लिये  किसी न किसी रुप में करते ही है लेकिन जब से उसने किसी  पंडित के मुख से यह कथा सुनी कि -
              " एक बार सीता माता मांग मे सिन्दूर भर रही थी , तो हनुमान जी बहां पधारे । उन्होने सीता जी से पूछा ;
" माता आप सिन्दूर क्यो लगाती है ?
तो सीता जी ने उत्तर दिया ;  " पुत्र यह सिन्दूर मेरे स्वामी श्री रामचन्द्र जी को बहुत पसन्द है । जब मै इसे लगाती हूं तो वह मुझ पर परम प्रसन्न होते है इसलिये मै इसे लगाती हूं ।
और जो भी सुहागिल स्त्री सिन्दूर लगाती है उससे उसके पति परम प्रसन्न होते है।
यह वाक्य शायद पंडित जी ने खुद जोडा होगा ।खैर जो भी हो....
         यह बात हनुमान जी और हमारी सुधा ने शायद समान रूप से सुनी समझी।
ऐसा कहा जाता है -
कि हनुमान जी उसी क्षण से पूरे बदन मे सिन्दूर पोतने लगे ।
और हमारी सुधा ने तो सिन्दूर लगाने और श्रृंगार करने का नया अविष्कार ही कर डाला।
                हर माल पांच रुपये बाली लिपिस्टिक की पेंदी घुमा कर  पहले लिपिस्टिक  निकालती , फिर मीडियम साइज की कील की टाॅप उस लिपिस्टिक पर कस कर रगडती , जब कील के टाॅप पर लिपिस्टिक पुत जाती , तब वह कील की टाॅप अपने माथे के बीचोबीच लगाती , जब माथे पर लिपिस्टिक का गोल ठप्पा लग जाता ,तब सूखे हुये सिंदूर में  कील की टाॅप डुबो कर  माथे पर लिपिस्टिक के ठप्पे के ऊपर पूरती ।
ऐसे बनती थी उसकी सुहाग की टिकुली।
            उसके बाद उसी कील के नुकीले हिस्से से सिर के अगले भाग से लेकर आधे सिर की मांग चमकीले लाल सिन्दूर से भरती ।
"कहती इससे पति की उमर लम्बी होती है।"
          एक बार मैने कहा ; " सीधे बिन्दी ही क्यों नही लगाती ? "
तो उसने कहा ; " न जी , सिन्दूर की ही बिन्दी लगाने से पति प्यार करता है ऐसा तो सींता मंइयां ने भी कहा और
बडी बूढी  भी कहती है ।
और फिर फिक्क से हंस पडी।
काजल लगाने का भी उसका निराला अंदाज था।
    बडी बडी आंखों में काजल भी ऐसे लगाती जैसे  हेमामालिनी के काजल सी रेखें उसके भी आँखो के बाहर निकले ।
            इसके लिये वह पहले तर्जनी अंगुली में काजल भर कर आंखो में लगाती फिर कंघे की नोक से आँखो के बाहर की लकीरें खींच कर दोचार मिनट चेहरा दांये बांयें करके शीशे में निहारती।
      सिन्दूर काजल के बाद बारी आती होठ रंगने  की।
       तो जिस लिपिस्टिक को सिन्दूरी टिकुली लगाने के लिये वह गोंद सा इस्तेमाल करती , उसी लिपिस्टिक को तर्जनी पर रगड कर होठो पर घिस लेती ।
            पैरों में रोज महाउरी लगाती।
फिर छोटी सन्दूकची नुमा पिटारी का उटकता सा ढक्कन लगा कर बडे जतन से पिटारी के पांच बार पाँव छूकर  बडी श्रद्धा के साथ आले में सजा देती भगवान की तस्वीर की नाईं।
मै पढने के लिये अपने भाई के साथ शहर चली आयी थी।
इस बीच हमारा कभी कभार ही मिलना होता था ।
या तो जब वह गांव आती और मै भी स्कूल-काॅलेज की छुट्टी के दौरान वहां होती।या मै ही कभी कभार उससे मिलने उसके घर चली जाती ।
लेकिन हम दोनो एक दूसरे से चिट्ठी पत्री से हमेशा जुडे रहे।
मेरी शादी के बाद जब वह मुझसे मिली तो कुछ उदास सी लगी
      एक प्यारे से बेटे की मां बन चुकी थी वह।
           मैने उसकी उदासी का कारण पूछा तो टालमटोल करती रही। जब मैने अपनी बचपन की दोस्ती की कसम दी तो वह फफक पडी।
      उसने मुझे बताया ; " कि उसका पति उसे प्यार नही करता ।बेल्टो के नीले निशानो का भी उसने मुझे साक्षी बनाया।
जिस सौन्दर्य पर मेरी सखी इतराती थी, उसी सौन्दर्य से उसके पति को ढेरो शिकायतें थी ।असल में वह सुधा में सुरैया की नाक , कामिनी कौशल की आवाज , गीतादत्त की अदा , मधुबाला का हुस्न ढूंढ रहा था ।लेकिन मिली उसे  गांव की सीधी सच्ची पतिव्रता सुधा ।
         घर बालो के जोर दवाब में उसने शादी तो कर ली लेकिन निभा नही पा रहा था और इस सबमें पिस रही थी बेचारी सुधा।
            हर रात तो क्या कई कई रातों  वह घर नही आता ।
      सुधा कितना तडपती होगी इसका अंदाजा मै आसानी से लगा सकती थी ।
      जिसने जीवन भर एक ही सपना देखा हो उसके लिये उसके पति का कई कई रातों घर न आना ठीक वैसा ही रहा होगा जैसे हाथ में आया मोती  फिसल कर समुद्र में गिर जाये।
वह बहुत हताशा थी।
            लेकिन हताशा अपना शिकंजा जकडे उससे पहले ही वह तमक कर कहती ;
  " देखना उमा , आयेगा वह। उसे आना पडेगा ।आखिर मुझमे क्या कमी है ? मै सुन्दर हूं ,पतिव्रता हूं , घर की देखभाल भी अच्छे से करती हूं ,उनकी हर इच्छा मानती हूं ,चाहे वह कैसी भी हो , तुम समझ रही हो न ,मै क्या कहना चाह रही हूं ....
और क्या चाहिये एक मर्द को ।"
        मै उसका भोलापन और विश्वास देखकर कभी यह न कह पाती कि नीली फिल्मों के एक्शन पति पर राज करने के लिये काफी नही।
पति पर राज तो किस्मत कराती है ।
   एक दिन सुना उसका पति हमेशा के लिये किसी और का होकर चला गया ।
      उसके लिये छोड गया एक चौदह साल का बेटा और एक निजी घर ।
           दो जून की रोटी का जुगाड करना, बेटे की फीस की चिन्ता में रात दिन घुलना,  रिश्तेदारों की ढिठाई , हँस कर या रोकर झेलना ही उसकी नियति बन गये थे।
       अब उसके पास जमापूंजी के नाम पर  उसका न के बराबर पढाई ,भोलापन और एक अपना मकान था ।
कभी वह रजाई में धागे डालती है ।कभी लिफाफे बनाती है। कभी आधा मकान लीज पर उठाती है....
सब कुछ बदल गया ।
     बेटे ने बहुत समझाया, कि जाने बाला चला गया ,उसे भूल जाओ लेकिन उसका विश्वास कहता वह जरूर लौटेगा।
दिन तो चाहें जैसे हो कट ही जाते है ।
         ग्रहों की चाल बदली । एक दिन उसका विश्वास रंग लाया ।
वह  वापस लौटा लेकिन नशे की हालत में हजारों बीमारियों के संग ।
बेटे ने धिक्कार कर मुंह फेर लिया ।
          उसे देख सुधा के चेहरे पर भी कई रंग आये गये ।एक बार तो उसने भी मुंह फेर लिया पूरी रात वह चौखट के इस तरफ और पति चौखट के उस तरफ बैठा रहा ।नशे में बडबडाते हुये वह अभी भी पीछे छूटे रिश्ते को याद कर रहा था ।
जीवन में पहली बार सुधा इतना रोयी थी उसका दिल ऐसा टूटा कि उसकी
  किरचें रोंयें रोयें में चुभ गयीं । मांग में भरा सिन्दूर उसने अपने हाथों खुरच डाला।
मन ही मन उसने जाने क्या निश्चय किया
दूसरे दिन धूल मिट्टी में लोट रहे पति को उठा कर घर लायी ।
            तब से दोनो साथ हैं।
                 आज काफी समय बाद जब  मै उससे मिली तो उसका कायान्तर देख रहा नही गया तो सोफे की बांह पर बैठे बैठे चुपके से पूँछ ही लिया ;
" अरे  ! सुधा , सिन्दूर की जगह शिल्पा बिन्दी ने कब से ले ली ?और बह मांग का लम्बा सा सिन्दूर कहां गायब हो गया? लगता है ,शहर में रहते रहते बहुत माडर्न हो गयी हो । या बहू पोती पोतो ने बदल दिया दादी को ।"
      मैने उसके मेंहदी लगे हाथ अपने हाथों में लेकर मुस्कुराते हुये कहा।
       वह थोडा सा मुस्कुराई फिर धीमी आवाज मे बोली ; " उमा जब से यह लौटे है तब से मै सिन्दूर नहीं लगाती ।"
     उसकी बात सुन मैने अपनी आंखो में ढेर सारे प्रश्न चिन्ह भर लिये
            बात का छूटा सिरा थामते हुये उसने आगे कहा ; " जब ये लौटे थे तो सबसे तिरस्कृत थे ।यहां तक कि मुझे भी। इनसे घृणा हो गयी थी ।लेकिन इनकी हालत इतनी खराब थी , कि मुझे इन पर दया आ गयी । और मन में अनुसुइया की भांति ममत्व फूट पडा। उसी क्षण हम पति पत्नी से मां बच्चे में तब्दील हो गये अब तो ईश्वर से दिन रात एक ही प्रार्थना  है कि  ईश्वर इन्हे मुझ से पहले उठा ले ।मेरे सिवा इनका कोई नही है।
          यह तमाम तामझाम  रिश्ते दारों की गहमा गहमी मेंहदी बिन्दी लिपिस्टिक सब एक दिखाबा है क्योकि समाज यही दिखावा चाहता है।
वरना तो मेरा सिन्दूर तो कब का उजड चुका है।"
              वह ढोर डंगरो  के लिये भूसा सानी करते हुये मुझसे कहती  ;  " देखना उमा , एक दिन मै भी इस नरक से बाहर निकलूंगी।

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

 कहानी                                                                 चिन्मयी की कलम

   
रचना  व्यास
                                                                                                                                                     
             शाम की चाय चिन्मयी हमेशा अकेले ही लेती थी। वैसे अब घर में बहू और पोता भी थे पर बरसों से चली आ रही ये आदत वो कहाँ बदल पाई थी। चाय की चुस्कियों के साथ ढलते सूरज से भी संवाद होता था और लैपटॉप पर मेल चैकिंग भी। कितनी सजीव मुस्कान आई उसके चेहरे पर जब उसे अपना 30 साल पहले का वक्त याद आया। किराये के वन bhk फ्लैट की वो छोटी सी बाल्कनी जिसमें एक ओर लकड़ी की पुरानी टेबल और दूसरी ओर 'कभी काम आ जाये' की भावना से सहेजे गए अनुपयोगी सामान; उनके बीच 8-10 वर्ष की धूप-बारिश झेल चुकी वो केन की चेयर। उसी पर बैठ कर तो चिन्मयी लिखा करती थी। विपिन तो मजाक में उस कुर्सी को उसकी 'सृजन संगिनी' कहा करते थे। अनगिनत कहानियां और उसके प्रथम दो नॉवेल उसी पर तो बैठ कर रचे गए थे।                     
         वो तब अपने पसन्दीदा लेखकों को चिठ्ठियाँ लिखा करती थी। प्रकाशकों से पत्र व्यवहार चलता था। वही ढलता सूरज, वही चाय, वही पत्र व्यवहार। फर्क इतना है कि अब उस छोटे फ्लैट की जगह विशाल बंगला है, चिठ्ठियों की जगह मेल्स ने ले ली है और वो एक एंटेरप्रेनुएर न रहकर एक सफल स्थापित लेखिका बन चुकी है। सुकून तब होता है जब उसे नवोदित लेखकों के मैसेज मिलते है कि कैसे उसका लेखन उन्हें प्रेरित करता है। ये बदलाव उसे सबसे ज्यादा आंदोलित करता है। शहर की साहित्यिक गोष्ठियाँ उसके बगैर अपूर्ण मानी जाती है। कितने सधे होते है उसके शब्द! कैसा कसाव है उसके प्रस्तुतिकरण में ! उसका रचा साहित्य किस तरह पाठकों के अंतस को छू जाता है कि वे हर पात्र में अपना अक्स  ढूंढते-ढूंढते अनगिनत बार उसे पढ़ते है। चिन्मयी के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता है उसकी विषय विविधता। विपिन की ट्रांसफेरेबल जॉब के चलते उसने लगभग सारा भारत घूम लिया था। इस घूमन्तु जीवन ने उसे अनगिनत लोगोँ से मिलने और उन्हें जानने का अवसर दिया। उसका जीवन दर्शन था कि जिसने एक ढेले को  जान लिया उसने सारी मिट्टी समझ ली। क्योंकि खुद से तो वो तब ही मिलने लगी थी जब उसने अपने स्कूल के दिनों में कविता लिखना शुरू कर दिया था।
                                उसकी तन्द्रा टूटी  जब नेहा ने वो लाल गुलाबों का बुके उसके सामने रखा। वही जाने- पहचाने मोतियोँ से अक्षर...। कल ही तो शुभांश ने उससे थीम पूछी थी। आज कविता लिखकर अपनी आदर्श को भेज भी दी। पिछले सात महीनों से ये सिलसिला चल रहा है। तभी मैसेंजर घनघनाया, "कितने मार्क्स मैम?" उसकी टाइमिंग पर चिन्मयी हैरान थी। जब भी लाल गुलाबों के साथ उसकी कविता आती; उसके कविता पढ़ने तक ये मेसेज भी आ जाता। चिन्मयी ने उसे मार्क्स दिए; कुछ शब्द बदलने के सुझाव के साथ। ये रहस्यमयी युवा कवि प्रशंसक से कुछ ज्यादा हो चला था चिन्मयी के लिए क्योंकि दो - तीन बार कहने पर भी कभी उसने अपना नम्बर और पता नहीँ दिया। अब उसे इंतजार रहने लगा था कि कब शुभांश उसकी गद्य रचनाओ को कविता मेँ ढाल देगा या उससे थीम पूछकर कविता लिखकर उसे लाल गुलाबों के साथ भेज देगा। लाल ही क्योँ?
                              चिन्मयी की कलम तभी चलती थी जब वो भीतर से या तो बहुत प्रफुल्लित होती थी या बहुत उदास। जैसे किसी स्त्री के जीवन में मासिकधर्म के दिन होते है, गर्भावस्था का काल होता है वैसे ही उसके लेखन के मूड के भी अनगिनत रंग थे। जब विचार करके लिखने बैठती तो घण्टों बाद भी कागज धवल ही रहता था। जब कुछ आवेग-सा छाती में, पेट में उठ-उठकर आता तब भी शब्द सध ही नहीँ पाते थे। कितनी बैचेनी भरे दिन होते है वे। बाहर से सब नॉर्मल पर भीतर...। लगता कि मोबाइल कहीँ फेंक दे;  सिर्फ पढ़ती रहे, कमेंट कुछ न दे। फिर आती एक शून्यावस्था। फिर अंततः सन्तुलन... अब कलम उठाने का सही समय। पर ये शुभांश तो कभी  चौबीस घण्टे से ज्यादा समय ही नहीँ लेता कविता लिखने के लिए। अतीत की एक याद हूक-सी जगा गई चिन्मयी के अंतस मेँ। फिर जब लाल गुलाब अपने बेड के सिरहाने सजाने लगी तो उस हूक ने बलवती होने का प्रयास किया। अनचाहे ही स्वर्गीय दादाजी का स्नेहिल से कठोर होता चेहरा आँखों के आगे घूमने लगा। एक तो नो महीनों से लेखन का पतझड़ चल रहा है तिस पर ये हूक। उसने गुलाबों की एक-एक पंखुड़ी निकालकर बाथ टब में पानी की सतह पर लाल  चादर बिछा दी। अनगिने मिनट उसमें बिताकर जब उसने भीगा तन पौंछा तो लगा कि मलय की लिखी एक-एक कविता को भी वो जेहन से पौंछ देगीं। अनजाने ही सही उसे गुमनामी का श्राप लगने की हिस्सेदार तो वो थी ही।
                              आज शाम फिर मेल्स देखने लगी तो सभी का  एक ही सवाल था "कब आ रही है आपकी नई रचना। इंतजार में हैँ।" क्या जवाब दे चिन्मयी। खुद हैरान थी इतना लम्बा उपवास तो उसकी कलम ने कभी नहीँ किया था। जाने कब पारणा होगा। खाली बैठो तो अतीत सताता ही है। 30 वर्ष पहले दादाजी की हठधर्मिता ने साहित्य जगत को मलय जैसे कवि से वंचित कर दिया। तभी उसके आगे लाल गुलाबों का बुके मुस्करा रहा था। शुभांश की कविता पढ़ी। एक-एक शब्द उसके जेहन पर अंकित हो गया। शुभांश शाबासी का पात्र था। उसने मैसेंजर पर उसे घर आने का निमन्त्रण दिया। बड़ी विनम्रता से वो इस बार भी टाल  गया। चिन्मयी के सन्देह रुपी पौधे की जड़ कुछ और गहरी हुई। कहीँ मलय...। गुलाब अब मौन थे। राज़ खोलने का कोई संकेत उन्हें नहीँ देना था। मानो भेजने वाले ने सिखाया- पढ़ाया हो। मलय के आँगन के गुलाब भी कितने वफादार थे उसके। उसकी दादी रात को चीन्ह कर सोती कि सुबह मन्दिर में इसे चढ़ाना है। सुबह कॉलेज जाने से पहले ही मलय चाँद की ओट में लिखी अपनी नई कविता लाल गुलाब के साथ उसकी खिड़की से चिन्मयी की डायरी में सरका जाता था। इधर चिन्मयी की गद्य रचना, उधर मलय की उस पर कविता  और इधर गुलाब का खिलना। कितने बतियाते थे उसके दिए गुलाब। तभी तो वो नया-नया रोज लिख पाती थी। दादी मरते दम तक न जान पाई थी कि वो गुलाब कैसे चिन्मयी के आँचल में आकर उसके मन के एक-एक रेशे को सुर्ख लाल करके महकाते है। एक ही धर्म, एक से पारिवारिक संस्कार- माँ पिताजी को तो सहज स्वीकार्य था ये रिश्ता। गुलाबों की महक बढ़ती गई। इस बार गुलाब के मुख पर ये वादा था कि उसकी कलम कोई अन्य विषय पर कभी कविता नहीँ लिखेगी। सिर्फ चिन्मयी के गद्य ही विषय होंगे। शेक्सपियर के लव सोनेट्स को वो जीने-से लगे थे।
तभी गुलाब पर वज्रपात हुआ। वैदिक धर्मानुसार वर वधू से आयु में बड़ा होना चाहिए। उसके आँसूओं ने सारे सहेजे सूखे गुलाबों को भिगो दिया। क्षोभ भरे गुलाब पूछ रहे थे कि मलय की माँ को पांच दिन पहले प्रसव पीड़ा क्यों न हुई। आखिरी गुलाब ने रोकर मलय के शहर छोड़ने का सन्देश दिया। साथ में एक वादा भी कि वह सुखद जीवन जियेगा पर लिखेगा कभी नहीँ पर चिन्मयी की कलम कभी मौन नहीँ होनी चाहिए। चिन्मयी का गार्हस्थ्य  जीवन और कलम संजीदगी से चलते रहे और सफल भी हुए। पर वो हूक...। वो लाल गुलाबों की भावाभिव्यक्ति...। और  मलय का वैराग्य...। जीवन की इस सांध्य वेला में कुछ तो समर्पण करना होगा उसे भी। इधर शुभांश मिलने को तैयार ही नहीँ। ऐसी व्याकुलता इस वानप्रस्थी अवस्था में! घण्टा भर शॉवर के नीचे खड़ी रही। लाल गुलाबों ने मौन नही तोड़ा। वाइटरॉब में लिपटी चिन्मयी ने बुके उठाया और पूजाघर में चली गई। मुखमण्डल दृढ़ हो चला था। एक-एक गुलाब निकालकर क्रीड़ा कमनीय युगल सरकार के चरणों में चढ़ाती गई। मानो अब कभी विचलित न होने की प्रतिज्ञा कर रही हो। साथ में कलम की समाधि की मौन प्रतिज्ञा भी हो गई। आश्रय का पदगान कर जब बाहर निकली तो अंतस वाइटरॉब जैसा ही धवल था। ( लेखिका युवा कहानीकार हैं )

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता''                                                                                                                                                   

संगीता सिंह 'भावना'-

आज भारतीय नारी ने इस उक्ति को स्वयं परिभाषित किया है हालाँकि भारतीय समाज में वह अबला व् पीडिता रूप में ही ज्यादा दिखलाई गई है | स्त्री जगत को आधी आबादी की संज्ञा दी गई है ,पर उस आधी दुनिया की कमान सदैव पुरुष के हाथ में होताहै और समय-समय पर वह पुरुष द्वारा अनुशाषित होते रहती है कहने का तात्पर्य यह है कि तमाम उच्च मानदंडों के बावजूद आज भी स्त्री पुरुषों के अधीन है | हालाँकि, आज नारी ने भी अपनी अस्मिता के प्रति काफी सजगता दिखाई है,और अपना एक मजबूत आधार बनाने में तत्पर दिखाई दे रही है ,जिसका सबसे बड़ा उदाहरण वो 'स्त्री लेखन' के रूप में प्रस्तुत कर रही है | ऐसा कर वह कुछ समय के लिए ही सही स्वतंत्रता का अनुभव करती है | अपने अंतर्मन के भावों को पन्नों पर उकेरकर अपने मन-मष्तिष्क को संतुष्ट करती है,भले ही थोड़े समय के लिए ही सही पर इन क्षणों में वह अपनी पीड़ा को भूल जाती है और अपनी अहमियत को समाज के सामने परोसती है | हमारे देश में स्त्रीयां हमेशा से ही साहित्य सृजन करती रही हैं, यही नहीं भारत के आलवा अन्य देशों में भी स्त्रीयों के कलम का जादू चलता आया है | स्त्रीयों में खुद को व्यक्त करने का कई तरीका है जिसमें साहित्य एक अभिन्न तरीका है | आज स्त्रीयां करीब-करीब सभी विधाओं में लिख रही हैं और अपने अनुभव,अनुभूतियाँ और विचारों के जरिये वह खुद को प्रस्तुत कर रही है | साहित्य के जरिये वह अपने दुःख-दर्द ,हर्ष उल्लास तथा जीवन से मिले कटु अनुभवों को भी प्रकट कर रही है | वह सिर्फ ओरतों की पीड़ा को ही नहीं बल्कि समाज समय और दुनियां की तमाम गतिविधियों को अपने कलम की ताकत से विस्तार दे रही हैं | स्त्री साहित्य समाज में फैले उन सभी विसंगतियों को भी अपने लेख-आलेखों द्वारा समाज में परोस रही है जिन्हें वो सामान्य रूप में  उजागर नहीं  कर पा रही थी | समाज में हो रहे परिवर्तन,बदलती स्त्री, बदलते रीति-रिवाज,पुरुष मानसिकता इन सभी चीजों पर आज स्त्री बड़े ही धड़ल्ले से लिख रही है और समाज को वर्तमान की सच्चाई से अवगत करा रही है | यह एक बेहतरीन और सुन्दर प्रयास है साथ ही यह कितने गर्व की बात है कि सदियों से दोयम दर्जा प्राप्त स्त्री अपनी दासता से मुक्त होने को निरंतर प्रयासरत है | समय और समाज की हर गतिविधियों को टटोलते हुए अपनी बातोंको बड़ी ही स्पष्टवादिता से स्त्री अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के सामने साहसपूर्ण अभिव्यक्त कर रही है ,निश्चित ही यह एक  सराहनीय प्रयास है | समकालीन साहित्यकारों ने अपने साहित्य में पुराने दकियानूसी विचारों को  तोड़ते हुए एक जीती-जागती ,संवेदनशील और सतत नारी की प्रतिमा को समाज के सामने उजागर किया है | साहित्य में स्त्री स्वातंत्र्य का कारवां आज अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ निर्वाध व् अनवरत रूप से गतिमान है | स्त्री को अपनी अस्मिता की पहचान और अपने दायित्वबोध का अहसास कराने में में समकालीन साहित्य का बहुत बड़ा योगदान है (लेखिका पत्रिका की सह संपादिका)

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

.मित्र अकल्पित रुप से किसी शुभ घडी में जीवन में अवतरित हो जाता है और जीवन यात्रा के संकट उसके आ जाने से कम हो जाते हैं । और कभी ऐसी घटना घटित होती है कि जीवन की नॉव डगमगानें वाली थी , मान- गुमान नदी की धारा में बह जाने वाले थे , अकस्‍मात् अलक्ष्‍य जन्‍मा मित्र का उदय उसी धारा में हो गया , मित्र के प्रताप से धारा ही सूख गयी । महाभारत की कथा में युवराज सुयोधन के लिए कर्ण ऐसा ही मित्र बनकर आया था । आचार्य द्रोण रंगभूमि में राजकुमारों के अस्‍त्र शस्‍त्र का प्रदर्शन राजपरिवार तथा संभ्रान्‍त प्रजाजनों के समक्ष करा रहे थे । जब पाण्‍डु -पुत्र राजकुमार अर्जुन ने अपने बाणों से आग ,पानी बरसाने का ,बादलों के छाने ,हवा से उनके उड़ जाने का ,गगन को बाणों से आच्‍छादित कर देने आदि के अनेक कौशल दिखाये तब घृतराष्‍ट्र -पुत्र सुयोधन अपने में तथा भाइयों में इस वीरता का अभाव जानकर कातर हो उठा । थोड़ी ही देर में आचार्य द्रोण ने घोषित किया ,हमें गर्व है कि कुन्‍ती पुत्र आज संसार का सर्वश्रेष्‍ठ धनुर्धर है । इस घोषणा के समाप्‍त होते ही एक दूसरा राजकुमार सूत पुत्र कर्ण रंग मंच पर अपने आप आ गया , उसने कहा आचार्य ऐसी घोषणा न करें ,अर्जुन की समानता मैं कर सकता हूॅ मुझे इसका अवसर दिया जाये । रंगसभा अवसन्‍न हो गयी , सब की दृष्टि कर्ण की ओर लग गयी । संघर्ष का टालना अनिवार्य हो गया , अन्‍यथा रंग में भंग ही होने जा रहा था । लेकिन दूसरी ओर सुयोधन की दीनता दूर हो गयी , प्रफुल्लित होकर कर्ण के निकट आ गया । तब तक किसी ने कहा कर्ण --तुम सूत पुत्र हो ,अर्जुन राजकुमार है । राजकुमार से सामना करने का अधिकार राजपुत्र को ही है ,तुमको नहीं । सुयोधन ने तत्‍काल कहा यदि ऐसी बात है तो कर्ण को अंग देश का राजा बनाता हूॅ और राजमुकुट पहना रहा हूॅ ,इतना कहकर उसने कर्ण के मस्‍तक पर राजमुकुट रख दिया ,उसके साथियों ने जय घोष किया अंगराज कर्ण की जय । संघर्ष टालने के लिए रंग भूमि विसजिर्त कर दी गयी । इसके साथ ही सुयोधन की अटूट मैत्री का अनोखा जन्‍म उस घ्‍ाटना के बीच हो गया । --------पूज्‍य डॉ0 जयशंकर त्रिपाठी

मंगलवार, 2 अगस्त 2016


आपकी अपनी हिन्‍दी साहित्‍य की त्रैमासिक पत्रिका करुणावती साहित्‍य धारा ने अपने प्रकाशन के सफलतापूर्वक चार वर्ष सितम्‍बर ,२०१६ में पूर्ण करने पर इसमें निरंतर अपनी लेखनी के माध्‍यम और इसके प्रचार-प्रसार में सहयोग देने हेतु अपने रचनाकारों को एवं सहयोगियों को सम्‍मानित करने का निर्णय लिया है । अपने रचनाकारों को सम्‍मानित कर करुणावती साहित्‍य धारा परिवार स्‍वयं को गौरान्‍वि‍त महसूस करेगा । रचनाकारों को पूज्‍य पंण्डित डॉ० जयशंकर त्रिपाठी जी की पुण्‍य तिथि कार्यक्रम में सम्‍मानित किया जायेगा । विगत वर्षों की भॉति इस वर्ष भी पुण्‍य तिथि कार्यक्रम ७ सितम्‍बर २०१६ को इलाहाबाद में ही सम्‍पन्‍न होगा । किन्‍हीं कारणों से कार्यक्रम की तिथि बदलने पर आपको उपलब्‍ध संसाधनों / माध्‍यमों से सूचित किया जायेगा । सम्‍मानित रचनाकारों एवं सम्‍मानित सहयोगियों के नामों का चयन करुणावती साहित्‍य परिवार ने किया है । सम्‍मानित रचनाकार है :- आदरणीय कमलेश भटट कमल, डॉ० गिरिजाशंकर शास्‍त्री ,श्री दिनेश कुशभुवनपुरी , श्रीमती रचना व्‍यास, श्री कामता प्रसाद तिवारी ,श्रीमती विभारानी श्रीवास्‍तव , श्रीमती रंजना सिंह , श्रीमती संगीता सिंह 'भावना', डॉ० ललित भारतीया ,श्री ए० के० उपाध्‍याय ,श्री दिनेश बहादुर सिंह,श्री दिनेश पारीक, सुश्री सफलता सरोज ,सुश्री शिप्रा त्रिपाठी , श्री रवीन्‍द्र कुमार त्रिपाठी ,श्रीमती अल्‍का गुप्‍ता , श्री सुरेश सक्‍सेना , श्री मुकेश कुमार सिन्‍हा, श्रीमती प्रियंवदा अवस्‍थी ,डॉ०मोना दुबे , श्री पद्मसम्‍भव श्रीवास्‍तव ,श्री पंकज जोशी , श्री विनोद कुमार उपाध्‍याय , । आप सभी सम्‍मानित होने वाले रचनाकार दिनॉक ०७/९/२०१६ को इलाहाबाद सादर आमंत्रित हैं ।  कार्यक्रम में आपकी उपस्थिति हमारे लिए गौरव एवं सम्‍मान की बात है । .......................................................................पूजा त्रिपाठी ,प्रबन्‍ध व्‍यवस्‍थापक एवं संयोजक 'करुणावती साहित्‍य धारा^

रविवार, 17 जुलाई 2016

नियम निर्धारण के किए साहित्‍य शास्‍त्र की रचना उचि‍त नहीं जान पड़ती और न ही स्‍वाभाविक ही है ।साहित्‍य की वेगवती सरिता नियमों की अवहेलना कर स्‍वछंदतापूर्वक बहने में ही प्रसन्‍न रहती है । साहित्‍य संबन्‍धी शास्‍त्रकार को अनधिकार चेष्‍टा नहीं करनी चाहिए । उसका यह कार्य नहीं है कि वह सरिता के बहाव के सामने बॉध बॉधने की चेष्‍टा करें । उसे चाहिए कि वह उस प्रवाह के दर्शन करें ,सुगम्‍य नौका द्वारा उसमें विहार करे, उसके बॅधें हुए घाटों तथा तट की शोभा का आनंद ले ।

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

पुस्‍तक :-मेरे हमदम , लेखिका:-संगीता सिंह'भावना'
प्रकाशक:- रत्‍नाकर प्रकाशन,इलाहाबाद 
मूल्‍य:- ७०/- रुपये (पेपर बैक संस्‍करण)
आज संगीता सिंह 'भावना' जी की किताब 'मेरे हमदम' ऑखों के सामने पड़ी तो यही पुस्‍तक पढने लगे । बहुत अच्‍छा काव्‍य संग्रह है ।भूमिका में एक जगह डॉ. नवेन्‍द्र कुमार सिंह जी (वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता ,ह‍िन्‍दी विभाग,बुन्‍देलखण्‍ड, झॉसी ) ने लिखा है संगीता सिंह 'भावना' की रचनाओं के संग्रह का मेरे हमदम उतना ही सार्थक है ,जितनी प्रेम की प्रवहमान सरिता के बीच उठती -आगे बढती शब्‍द तरंगें ---
तुम समुद्र की गहराई हो
मधुर हवा का झोंका हो ,
तुम विश्‍वास की अटूट डोर हो
जीवन के अनुभवों की अनुपम ढेर हो
जीवन के हर उतार-चढाव में
तुम्‍हारा होना सुखद एहसास है ........(थोडी दूर साथ चलो)

बहुत अच्‍छी भूमिका लिखी डॉ. सिंह साहब ने ,मैनें पढा वाकई 'मेरे हमदम' काव्‍य संग्रह लाजवाब है ,कई रचनॉए ऐसा लगता है कि जैसे आपकी बात को कह रहीं हैं । रचनाकार आपके मन की जानता है ।
सोचती हूॅ हर सम्‍बन्‍धों को
बहुत बारीकी से
और इस निष्‍कर्ष पर पहुॅचती हूॅ कि
हर रिश्‍ते मॉगते हैं समर्पण
हम, जिसे शायद मालूम ही नहीं
प्रेम समर्पण..........................(अकेले)
सभी रचनॉए एक से बढकर एक हैं ।संगीता सिंह जी के आलेखों और कहानियों की तरह निश्चित ही ये काव्‍य संग्रह 'मेरे हमदम' भ्‍ाी लोगों को बहुत पसंद आयेगा । करुणावती साहित्‍य धारा परिवार की तरफ से एक पुन: हार्दिक शुभकामनाऍ और बधाई । साहित्‍य में नित नये सोपान यूॅ ही चढती रहें ।