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गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

 कहानी                                                                 चिन्मयी की कलम

   
रचना  व्यास
                                                                                                                                                     
             शाम की चाय चिन्मयी हमेशा अकेले ही लेती थी। वैसे अब घर में बहू और पोता भी थे पर बरसों से चली आ रही ये आदत वो कहाँ बदल पाई थी। चाय की चुस्कियों के साथ ढलते सूरज से भी संवाद होता था और लैपटॉप पर मेल चैकिंग भी। कितनी सजीव मुस्कान आई उसके चेहरे पर जब उसे अपना 30 साल पहले का वक्त याद आया। किराये के वन bhk फ्लैट की वो छोटी सी बाल्कनी जिसमें एक ओर लकड़ी की पुरानी टेबल और दूसरी ओर 'कभी काम आ जाये' की भावना से सहेजे गए अनुपयोगी सामान; उनके बीच 8-10 वर्ष की धूप-बारिश झेल चुकी वो केन की चेयर। उसी पर बैठ कर तो चिन्मयी लिखा करती थी। विपिन तो मजाक में उस कुर्सी को उसकी 'सृजन संगिनी' कहा करते थे। अनगिनत कहानियां और उसके प्रथम दो नॉवेल उसी पर तो बैठ कर रचे गए थे।                     
         वो तब अपने पसन्दीदा लेखकों को चिठ्ठियाँ लिखा करती थी। प्रकाशकों से पत्र व्यवहार चलता था। वही ढलता सूरज, वही चाय, वही पत्र व्यवहार। फर्क इतना है कि अब उस छोटे फ्लैट की जगह विशाल बंगला है, चिठ्ठियों की जगह मेल्स ने ले ली है और वो एक एंटेरप्रेनुएर न रहकर एक सफल स्थापित लेखिका बन चुकी है। सुकून तब होता है जब उसे नवोदित लेखकों के मैसेज मिलते है कि कैसे उसका लेखन उन्हें प्रेरित करता है। ये बदलाव उसे सबसे ज्यादा आंदोलित करता है। शहर की साहित्यिक गोष्ठियाँ उसके बगैर अपूर्ण मानी जाती है। कितने सधे होते है उसके शब्द! कैसा कसाव है उसके प्रस्तुतिकरण में ! उसका रचा साहित्य किस तरह पाठकों के अंतस को छू जाता है कि वे हर पात्र में अपना अक्स  ढूंढते-ढूंढते अनगिनत बार उसे पढ़ते है। चिन्मयी के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता है उसकी विषय विविधता। विपिन की ट्रांसफेरेबल जॉब के चलते उसने लगभग सारा भारत घूम लिया था। इस घूमन्तु जीवन ने उसे अनगिनत लोगोँ से मिलने और उन्हें जानने का अवसर दिया। उसका जीवन दर्शन था कि जिसने एक ढेले को  जान लिया उसने सारी मिट्टी समझ ली। क्योंकि खुद से तो वो तब ही मिलने लगी थी जब उसने अपने स्कूल के दिनों में कविता लिखना शुरू कर दिया था।
                                उसकी तन्द्रा टूटी  जब नेहा ने वो लाल गुलाबों का बुके उसके सामने रखा। वही जाने- पहचाने मोतियोँ से अक्षर...। कल ही तो शुभांश ने उससे थीम पूछी थी। आज कविता लिखकर अपनी आदर्श को भेज भी दी। पिछले सात महीनों से ये सिलसिला चल रहा है। तभी मैसेंजर घनघनाया, "कितने मार्क्स मैम?" उसकी टाइमिंग पर चिन्मयी हैरान थी। जब भी लाल गुलाबों के साथ उसकी कविता आती; उसके कविता पढ़ने तक ये मेसेज भी आ जाता। चिन्मयी ने उसे मार्क्स दिए; कुछ शब्द बदलने के सुझाव के साथ। ये रहस्यमयी युवा कवि प्रशंसक से कुछ ज्यादा हो चला था चिन्मयी के लिए क्योंकि दो - तीन बार कहने पर भी कभी उसने अपना नम्बर और पता नहीँ दिया। अब उसे इंतजार रहने लगा था कि कब शुभांश उसकी गद्य रचनाओ को कविता मेँ ढाल देगा या उससे थीम पूछकर कविता लिखकर उसे लाल गुलाबों के साथ भेज देगा। लाल ही क्योँ?
                              चिन्मयी की कलम तभी चलती थी जब वो भीतर से या तो बहुत प्रफुल्लित होती थी या बहुत उदास। जैसे किसी स्त्री के जीवन में मासिकधर्म के दिन होते है, गर्भावस्था का काल होता है वैसे ही उसके लेखन के मूड के भी अनगिनत रंग थे। जब विचार करके लिखने बैठती तो घण्टों बाद भी कागज धवल ही रहता था। जब कुछ आवेग-सा छाती में, पेट में उठ-उठकर आता तब भी शब्द सध ही नहीँ पाते थे। कितनी बैचेनी भरे दिन होते है वे। बाहर से सब नॉर्मल पर भीतर...। लगता कि मोबाइल कहीँ फेंक दे;  सिर्फ पढ़ती रहे, कमेंट कुछ न दे। फिर आती एक शून्यावस्था। फिर अंततः सन्तुलन... अब कलम उठाने का सही समय। पर ये शुभांश तो कभी  चौबीस घण्टे से ज्यादा समय ही नहीँ लेता कविता लिखने के लिए। अतीत की एक याद हूक-सी जगा गई चिन्मयी के अंतस मेँ। फिर जब लाल गुलाब अपने बेड के सिरहाने सजाने लगी तो उस हूक ने बलवती होने का प्रयास किया। अनचाहे ही स्वर्गीय दादाजी का स्नेहिल से कठोर होता चेहरा आँखों के आगे घूमने लगा। एक तो नो महीनों से लेखन का पतझड़ चल रहा है तिस पर ये हूक। उसने गुलाबों की एक-एक पंखुड़ी निकालकर बाथ टब में पानी की सतह पर लाल  चादर बिछा दी। अनगिने मिनट उसमें बिताकर जब उसने भीगा तन पौंछा तो लगा कि मलय की लिखी एक-एक कविता को भी वो जेहन से पौंछ देगीं। अनजाने ही सही उसे गुमनामी का श्राप लगने की हिस्सेदार तो वो थी ही।
                              आज शाम फिर मेल्स देखने लगी तो सभी का  एक ही सवाल था "कब आ रही है आपकी नई रचना। इंतजार में हैँ।" क्या जवाब दे चिन्मयी। खुद हैरान थी इतना लम्बा उपवास तो उसकी कलम ने कभी नहीँ किया था। जाने कब पारणा होगा। खाली बैठो तो अतीत सताता ही है। 30 वर्ष पहले दादाजी की हठधर्मिता ने साहित्य जगत को मलय जैसे कवि से वंचित कर दिया। तभी उसके आगे लाल गुलाबों का बुके मुस्करा रहा था। शुभांश की कविता पढ़ी। एक-एक शब्द उसके जेहन पर अंकित हो गया। शुभांश शाबासी का पात्र था। उसने मैसेंजर पर उसे घर आने का निमन्त्रण दिया। बड़ी विनम्रता से वो इस बार भी टाल  गया। चिन्मयी के सन्देह रुपी पौधे की जड़ कुछ और गहरी हुई। कहीँ मलय...। गुलाब अब मौन थे। राज़ खोलने का कोई संकेत उन्हें नहीँ देना था। मानो भेजने वाले ने सिखाया- पढ़ाया हो। मलय के आँगन के गुलाब भी कितने वफादार थे उसके। उसकी दादी रात को चीन्ह कर सोती कि सुबह मन्दिर में इसे चढ़ाना है। सुबह कॉलेज जाने से पहले ही मलय चाँद की ओट में लिखी अपनी नई कविता लाल गुलाब के साथ उसकी खिड़की से चिन्मयी की डायरी में सरका जाता था। इधर चिन्मयी की गद्य रचना, उधर मलय की उस पर कविता  और इधर गुलाब का खिलना। कितने बतियाते थे उसके दिए गुलाब। तभी तो वो नया-नया रोज लिख पाती थी। दादी मरते दम तक न जान पाई थी कि वो गुलाब कैसे चिन्मयी के आँचल में आकर उसके मन के एक-एक रेशे को सुर्ख लाल करके महकाते है। एक ही धर्म, एक से पारिवारिक संस्कार- माँ पिताजी को तो सहज स्वीकार्य था ये रिश्ता। गुलाबों की महक बढ़ती गई। इस बार गुलाब के मुख पर ये वादा था कि उसकी कलम कोई अन्य विषय पर कभी कविता नहीँ लिखेगी। सिर्फ चिन्मयी के गद्य ही विषय होंगे। शेक्सपियर के लव सोनेट्स को वो जीने-से लगे थे।
तभी गुलाब पर वज्रपात हुआ। वैदिक धर्मानुसार वर वधू से आयु में बड़ा होना चाहिए। उसके आँसूओं ने सारे सहेजे सूखे गुलाबों को भिगो दिया। क्षोभ भरे गुलाब पूछ रहे थे कि मलय की माँ को पांच दिन पहले प्रसव पीड़ा क्यों न हुई। आखिरी गुलाब ने रोकर मलय के शहर छोड़ने का सन्देश दिया। साथ में एक वादा भी कि वह सुखद जीवन जियेगा पर लिखेगा कभी नहीँ पर चिन्मयी की कलम कभी मौन नहीँ होनी चाहिए। चिन्मयी का गार्हस्थ्य  जीवन और कलम संजीदगी से चलते रहे और सफल भी हुए। पर वो हूक...। वो लाल गुलाबों की भावाभिव्यक्ति...। और  मलय का वैराग्य...। जीवन की इस सांध्य वेला में कुछ तो समर्पण करना होगा उसे भी। इधर शुभांश मिलने को तैयार ही नहीँ। ऐसी व्याकुलता इस वानप्रस्थी अवस्था में! घण्टा भर शॉवर के नीचे खड़ी रही। लाल गुलाबों ने मौन नही तोड़ा। वाइटरॉब में लिपटी चिन्मयी ने बुके उठाया और पूजाघर में चली गई। मुखमण्डल दृढ़ हो चला था। एक-एक गुलाब निकालकर क्रीड़ा कमनीय युगल सरकार के चरणों में चढ़ाती गई। मानो अब कभी विचलित न होने की प्रतिज्ञा कर रही हो। साथ में कलम की समाधि की मौन प्रतिज्ञा भी हो गई। आश्रय का पदगान कर जब बाहर निकली तो अंतस वाइटरॉब जैसा ही धवल था। ( लेखिका युवा कहानीकार हैं )

10 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. जी आदरणीय बिलकुल सही कहा .....आपने हरदम उत्‍साहवर्धन किया,ये स्‍नेह यूॅ ही मिलता रहे

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 11 फरवरी 2017 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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